शायरी में छुपा सच, जो जवाब मांगता है…
ख़ंजर से करो बात, ना तलवार से पूछो,
मैं क़त्ल हुआ कैसे, मेरे यार से पूछो।
फ़र्ज़ अपना मसीहा ने,अदा कर दिया लेकिन,
किस तरह कटी रात, ये बीमार से पूछो।
कुछ भूल हुई है तो, सज़ा भी कोई होगी,
सब कुछ मैं बता दूंगा, ज़रा प्यार से पूछो।
आंखों ने तो चुप रह के भी, रुदाद सुना दी,
क्यों खुल न सके, ये लब-ए-इज़हार से पूछो।
रौनक़ है मेरे घर में, तसव्वुर ही से जिसके,
वो कौन था राही, दर-ओ-दीवार से पूछो।।
✍️सईद राही…
कुछ शेर ऐसे होते हैं जो केवल पढ़े नहीं जाते, महसूस किए जाते हैं। मशहूर शायर सईद राही की यह ग़ज़ल भी उसी क़िस्म की है, जिसमें सवाल हैं, ज़ख़्म हैं और जवाब की तलाश है। यह शायरी किसी एक इंसान की नहीं, बल्कि हर उस दिल की आवाज़ है जो टूट कर भी बोलता नहीं।
कुछ रचनाएँ शायरी नहीं होतीं,वे चीख़ होती हैं…
मगर ख़ामोशी में कुछ अल्फ़ाज़ ऐसे होते हैं जो पढ़े नहीं जाते सीधा सीने में उतरते हैं, और सांसों को भारी कर देते हैं, सईद राही कि यह ग़ज़ल उन्हीं टूटे हुए सवालों की दस्तक है जो अक्सर दिल के दरवाज़े पर आकर बिना जवाब लौट जाते हैं, यह उन रिश्तो का हिसाब है जहां हथियार नहीं चले लेकिन भरोसे लहुलुहान हो गए, यह उस दर्द की कहानी है जिसे कोई अदालत नहीं सुनती बस दिल ही सहता है।
क़त्ल की कहानी: हथियार से नहीं, अपनों से सवाल…
“ख़ंजर से करो बात, ना तलवार से पूछो,
मैं क़त्ल हुआ कैसे, मेरे यार से पूछो।”
यह शेर इशारा करता है कि असली ज़ख़्म बाहरी हमलों से नहीं, अपनों की बेरुख़ी और बेवफ़ाई से लगते हैं। यहाँ शायर हथियारों को बेगुनाह ठहराता है और सवाल सीधे उन रिश्तों से करता है, जिन पर सबसे ज़्यादा भरोसा था।
इलाज पूरा हुआ, मगर रात अधूरी रह गई…
“फ़र्ज़ अपना मसीहा ने, अदा कर दिया लेकिन,
किस तरह कटी रात, ये बीमार से पूछो।”
यह पंक्ति समाज की उस सच्चाई को उजागर करती है, जहाँ इलाज तो मिल जाता है, मगर दर्द का एहसास कोई नहीं समझता। मसीहा अपना फ़र्ज़ निभा देता है, लेकिन रातें कैसे कटती हैं, यह केवल पीड़ित ही जानता है।
गुनाह की स्वीकारोक्ति और मोहब्बत की दरकार…
“कुछ भूल हुई है तो, सज़ा भी कोई होगी,
सब कुछ मैं बता दूंगा, ज़रा प्यार से पूछो।”
यह शेर इंसान की उस फ़ितरत को दर्शाता है जहाँ वह अपनी ग़लती मानने को तैयार है, मगर शर्त सिर्फ़ इतनी है कि सवाल नफ़रत से नहीं, मोहब्बत से किए जाएं। यहाँ संवाद की ताक़त को बेहद ख़ूबसूरती से रखा गया है।
ख़ामोश आंखों की गवाही…
“आंखों ने तो चुप रह के भी, रुदाद सुना दी,
क्यों खुल न सके, ये लब-ए-इज़हार से पूछो।”
जब शब्द साथ छोड़ देते हैं, तब आंखें बोलती हैं। यह शेर उन हालातों का आईना है जहाँ जज़्बात इतने गहरे होते हैं कि ज़ुबान उनका बोझ नहीं उठा पाती।
यादों से रौशन घर और अनदेखा मुसाफ़िर…
“रौनक़ है मेरे घर में, तसव्वुर ही से जिसके,
वो कौन था “राही”, दर-ओ-दीवार से पूछो।”
यह शेर मोह़ब्बत की उस याद को बयान करता है जो इंसान के जाने के बाद भी घर की दीवारों में सांस लेती रहती है। राही यहाँ सिर्फ़ शायर नहीं, बल्कि हर वो शख़्स है जो किसी की ज़िंदगी में आकर अमिट निशान छोड़ जाता है।
शायरी नहीं, ज़माने का बयान है…
सईद राही की यह ग़ज़ल महज़ अल्फ़ाज़ का मेल नहीं, बल्कि दर्द, सवाल, सच्चाई और इंसानी रिश्तों की गहराई का दस्तावेज़ है। यही वजह है कि यह शायरी दिलों तक पहुँचती है और देर तक असर छोड़ जाती है।
यह ग़ज़ल पढ़ते हुए
अगर आंखें नम हो जाएँ,
तो समझ लीजिए
आपने शायरी नहीं पढ़ी—
ख़ुद को पढ़ लिया है।
सईद राही के ये शेर
उन तमाम लोगों की आवाज़ हैं
जो सवाल तो रखते हैं,
मगर पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
यह रचना याद दिलाती है कि
हर ज़ख़्म का निशान बाहर नहीं होता,
कुछ दर्द ऐसे होते हैं
जो सिर्फ़ शायरी में बोलते हैं।
भारत समाचार 24×7.net…
ऐसी ही संवेदनशील और आत्मा को छू लेने वालीरचनाओं को पाठकों तक पहुँचाने का ईमानदार प्रयास करता रहेगा।

