फसल कटाई के बाद उल्लास, परंपरा और सामूहिकता का प्रतीक है छेरछेरा…
फसल कटाई के बाद आस्था, मेहनत और खुशियों को बांटने का नाम है छेरछेरा…
धान की खुशबू, बच्चों की किलकारी और सामूहिक उल्लास का पर्व: है छेरछेरा…
भारत समाचार 24×7.net…
विशेष रिपोर्ट…
सूरजपुर/छत्तीसगढ़।
छत्तीसगढ़ की माटी, उसकी खुशबू और किसानों की मेहनत का जीवंत उत्सव है छेरछेरा पर्व। धान की फसल कटाई के उपरांत मनाया जाने वाला यह लोकपर्व केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि किसान की मेहनत, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। ग्रामीण अंचलों में इन दिनों छेरछेरा को लेकर खासा उत्साह और हर्षोल्लास देखने को मिल रहा है।
अच्छी पैदावार की खुशी में झूम उठता है गांव…
किसानों का कहना है कि पूरे साल खेतों में पसीना बहाने के बाद जब धान की बालियां भरपूर उत्पादन के साथ घर आती हैं, तब उसी खुशी को छेरछेरा के रूप में साझा किया जाता है। यह पर्व इस बात का उत्सव है कि “हमने जो बोया था, वह प्रकृति की कृपा से बेहतर रूप में लौटा।” गांव-गांव में लोग घर-घर जाकर अन्न, चावल और दान एकत्र करते हैं और इसे सामूहिक खुशी के रूप में मनाते हैं।

लोकसंस्कृति और सामाजिक एकता का सशक्त संदेश…
छेरछेरा केवल फसल से जुड़ा पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सहयोग की भावना को भी मजबूत करता है। बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। लोकगीतों, पारंपरिक वेशभूषा और ग्रामीण परंपराओं के साथ यह पर्व छत्तीसगढ़ी संस्कृति की आत्मा को जीवंत कर देता है। यह पर्व संदेश देता है कि खुशियां तभी पूरी होती हैं, जब उन्हें समाज के साथ बांटा जाए।

परंपरा जो आज भी जिंदा है…
तेजी से बदलते समय और आधुनिकता के दौर में भी छेरछेरा जैसी परंपराएं आज भी गांवों में पूरी आस्था और विश्वास के साथ निभाई जा रही हैं। यह पर्व आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम कर रहा है और यह साबित करता है कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति आज भी उतनी ही समृद्ध और जीवंत है।
बच्चों की मुस्कान में छुपी परंपरा की आत्मा…
छेरछेरा पर्व की सबसे सुंदर और भावनात्मक तस्वीर तब सामने आती है, जब गांव के बच्चे टोलियां बनाकर घर-घर जाते हैं और “छेरछेरा… छेरछेरा…” कहते हुए धान मांगते हैं। यह केवल धान मांगने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि संस्कार, संस्कृति और सहभागिता की सीख है। बच्चों की आंखों में उत्साह, चेहरे पर मासूम मुस्कान और हाथों में इकट्ठा होता धान इस पर्व को जीवंत बना देता है।

अन्न के साथ बांटी जाती है खुशी और संवेदना…
ग्रामीणों का मानना है कि छेरछेरा के माध्यम से अन्न दान करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। किसान अपनी फसल का एक हिस्सा खुशी-खुशी बच्चों और समाज को समर्पित करते हैं। यह परंपरा बताती है कि छत्तीसगढ़ का किसान केवल खेत तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए सोचने वाला संवेदनशील मन रखता है।

लोकसंस्कृति और सामाजिक एकता का जीवंत उदाहरण…
छेरछेरा पर्व सामाजिक समरसता का मजबूत संदेश देता है। अमीर-गरीब, छोटे-बड़े का भेद मिटाकर पूरा गांव एक भाव में बंध जाता है। लोकगीत, परंपरागत वेशभूषा और ग्रामीण संस्कृति के रंग इस पर्व को और भी खास बना देते हैं। बदलते दौर में भी छेरछेरा यह साबित करता है कि छत्तीसगढ़ की जड़ें आज भी अपनी मिट्टी से मजबूती से जुड़ी हुई हैं।

